सनी देओल के फेमस 10 डॉयलॉग्स, जिन्होंने सनी को बनाया सुपरस्टार

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बॉलीवुड के सुपरस्टार सनी देओल ने राजनीति में कदम रख लिया है। सनी ने आज भारतीय जनता पार्टी ज्वॉइन की। उन्हें रक्षामंत्री निर्मला सीतरमन और पीयूष गोयल ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण कराई। इसी के साथ खबरें आ रहीं हैं कि सनी पंजाब की गुरदासपुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। बता दें कि इससे पहले गुरदासपुर सीट से सनी के पापा धर्मेंद्र चुनाव लड़कर जीत चुके हैं। इस खास मौके पर हम आपको सनी देओल के कुछ खास डॉयलॉग्स बताने जा रहे हैं जिन्होंने सनी को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

बॉर्डर (1997):

‘अगर वो कहते हैं कि नाश्ता जैसलमेर में करेंगे और डिनर दिल्ली में… तो हम कहते हैं कि हम नाश्ता भी कराची में करेंगे और लंच भी’

घायल (1990):
‘इस चोट को अपने दिल-ओ-दिमाग़ पर क़ायम रखना… कल यही आंसू क्रांति का सैलाब बनकर, इस मुल्क की सारी गंदगी को बहा ले जाएंगे’

दामिनी (1993):

‘चड्‌ढा, समझाओ.. इसे समझाओ। ऐसे ख़िलौने बाज़ार में बहुत बिकते हैं, मगर इसे खेलने के लिए जो जिगर चाहिए न, वो दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं बिकता, मर्द उसे लेकर पैदा होता है और जब ये ढाई किलो का हाथ किसी पर पड़ता है न तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है’

दामिनी (1993):

सच्चाई के लिए लड़ने वाला रहेगा, न ही इंसाफ मांगने वाला। रह जाएगी तो सिर्फ तारीख़ और यही होता रहा है मीलॉर्ड तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही है मीलॉर्ड लेकिन इंसान नहीं मिला मीलॉर्ड, इंसाफ नहीं मिला। मिली है तो सिर्फ ये तारीख़’

दामिनी (1993):

अगर अदालत में तूने कोई बदतमीजी की तो वहीं मारूंगा। जज ऑर्डर ऑर्डर करता रहेगा और तू पिटता रहेगा।

घातक (1996):

 ‘हलक़ में हाथ डालकर कलेजा खींच लूंगा हरा’मख़ोर.. उठा उठा के पटकूंगा। उठा उठा के पटकूंगा! चीर दूंगा, फाड़ दूंगा सा’ले’

घातक (1996):

‘पिंजरे में आकर शेर भी कुत्ता बन जाता है कात्या। तू चाहता है मैं तेरे यहां कुत्ता बनकर रहूं। तू कहे तो काटूं, तू कहे तो भौंकू’

ज़िद्दी (1997):

चिल्लाओ मत इंस्पेक्टर, ये देवा की अदालत है, और मेरी अदालत में अपराधियों को ऊंचा बोलने की इजाज़त नहीं’

गदर: एक प्रेम कथा (2001):

अशरफ अली! आपका पाकिस्तान ज़िंदाबाद है, इससे हमें कोई ऐतराज़ नहीं लेकिन हमारा हिंदुस्तान ज़िंदाबाद है, ज़िंदाबाद था और ज़िंदाबाद रहेगा। बस बहुत हो गया’

इंडियन (2001): 

‘चाहे हमें एक वक्त की रोटी ना मिले, बदन पे कपड़ा ना हो, सर पर छत ना हो, लेकिन जब देश की आन की बात आती है तब हम जान की बाजी लगा देते हैं’

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